Monday, March 8, 2021
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मनोरंजन के (पुराने संसाधन)

आज से ठीक 30, 35 साल पहले की दुनिया कुछ और थी और आज कुछ और है । बात यहां पर अगर मनोरंजन से शुरू करें तो गांव देहात या फिर शहर ही क्यों ना हो, हर जगह तीज त्यौहार का अलग ही मजा हुआ करता था । मनोरंजन के नए-नए तरीके और अलग-अलग संसाधन हुआ करते थे । बच्चों के बाहर के ढेर सारे खेल होते थे । जैसे विश- अमृत, बर्फ -पानी, गिल्ली -डंडा, लुका- छुपी आदि । कोई भी बच्चा शाम होते ही वह घर में बैठना पसंद नहीं करता था ।उसको तो ढेर सारे बच्चों के साथ खेलने में ही मजा आता था । और अगर बड़ों की बात करें तो चौपालों की बैठक, अपने उम्र कि बैठको मे देश दुनिया कि चर्चा, ताश, शतरंज या दीन बंधुवो कि चर्चा हो जाया करती थी । बात करें मंरोजन कि तो  नौटंकी ओं, रामलीलाओ  नाटक आदि का अलग ही मजा हुआ करता था

हंसी मजाक और ठहाको के साथ गूंज

पहले के वक्त मे शायद ही एकल परिवार होता हो । वरना संयुक्त परिवार का जोरो से चलन हुआ हुआ करता था । एक ही परिवार मे 20, 25 लोग होते थे । हंसी मजाक और ठहाको के साथ गूंज गुंजा करती थी ।  मनोरंजन की पुरानी पद्धति नई पीढ़ी के साथ नवीनीकरण के साथ समाज में घुलती जाती थी ।जब तक मोबाइल इंटरनेट का आविष्कार नहीं हुआ था ।तब तक पुरानी पद्धति अपनी संस्कृत का मूल रूप का नाश नहीं हो पाया था । नए अविष्कारों के साथ-साथ पुराने चलन जैसे लगता ही ventileter कि तरफ बड़ने लगी । इसका निष्कर्ष यह हुआ कि नये अविष्कार  के साथ साथ मनोरंजन के पुराने तरीके बदल गए  और बदलते ज़माने के साथ  मनोरंजन ने अपना स्वरुप ही बदल लिया । परिणाम वश  पुरानी पद्धति धीरे धीरे समाज से लुप्त होती चली गई ।

फिज़ाओ कि रंगत खुशनुमा और उसकी कहकहाट

आज जब कभी याद आता है। पुराने पद्धत के मनोरंजन को बहुत miss किया जाता है। जब कभी होली, दिवाली का मौसम आता था। तो फिज़ाओ कि रंगत खुशनुमा और उसकी कहकहाट महीना भर पहले से ही हवा में घूमने लगती थी । जब दिवाली का मौसम आने वाला होता था। तो हवाओं में भी इसकी धुन सुनाई पढ़ती थी । रातों में रामलीला, कीर्तन, ढ़ोल बाजे, गीत, सरिया,  नौटंकी आदि शुरू हो जाती थी। गरीब से गरीब, अमीर से अमीर इसके मनोरंजन का लुफ्त लिए बिना नहीं रह पाता था ।लोगों की भीड़ इकट्ठा हो जाती थी और उस भीड़ में अपना कोई मिल जाता था तो दुगनी खुशी बढ़ जाती थी। रामलीला, नौटंकी या कोई नाटक मंच पर देख कर दिल खुश हो जाता था । मंच पर छोटा सा ही हंसी मजाक भी हो जाता था, तो खुलकर हंसी आ जाती थी ।आज की बात करें तो बड़ा सा बड़ा मजाक भी वह हंसी वापस नहीं ला लापता है ।

चुगली बातें (मोहल्ले कि सारी खबर )

जब घरों की सभी औरतें सारा काम खत्म करके शाम को चाय की चुस्की के साथ मोहल्ले भर की खबर चटपटे मसालों के साथ एक दूसरे के सामने पेश किया जाता था किसी का रूठ ना हो या मनाना हो हाथ जोड़कर दिल से स्वागत किया जाता था । वह दिन भी थे जब औरतों के आस पास की पूरी खबर हुआ करती थी । किसके घर कौन आया कौन गया अपना तत्व की भावना हुआ करती थी । यहां तक कि इस बात कि भी खबर होती थी कि किस-किस के घर में क्या पक रहा था और कौन कौन सा सामान खत्म हो गया था।

वो दिन भी  होते थे । जब बिना किसी झिझक के आटा, चावल, तेल, नमक घर में खत्म होने पर पड़ोस से मांगने में शर्मिंदगी नहीं होती थी। यह अपनापन ही तो था। जो अपना हक यह प्यार समझ कर मांगने पहुंच जाया करते थे ।आज तो फोन का युग है। जहां रातों में उठ उठ कर अपने आसपास की चिंता हो या ना हो ।लेकिन फोन पर हाथ पहुंची जाता है। फोन का युग  शुरू होते ही टेलीपैथी का जमाना जैसे खत्म हो गया हो ।

क्या  शानदार जमाना था ?

पुराने दिन टेलीपैथी के जमाने हुआ करते थे । ना तो फोन से बात होती थी और ना ही जल्द डाक सेवा थी ।जो तुरंत की खबर इधर-उधर पहुंचा सके । इसलिए लोग टेलीपैथी का सहारा ज्यादा लेते थे । पहले  जहां कौवा छत पर कांव-कांव करता था और मेहमानों का आगमन का आभास हो जाता करता था । ऐसी ऐसी बातों से ही पूर्वानुमान लगाया जा सकता था । लेकिन इस आधुनिक जमाने में आज यह  विचार मन में आए तो हंसी आ जाए।  लेकिन कई बार पूर्वानुमान का निशाना सटीक भी बैठ जाया करता था। क्या  शानदार जमाना था ? और क्या शानदार जमाने की बातें थी ।

अगर कुछ है तो बस खोखला दिखावा है

पुराने दिनों की बात करें तो उस वक्त ऊंची ऊंची बिल्डिंग ए नहीं हुआ करती थी और ना ही आज की आधुनिक वाईफाई, टीवी, फोन हुआ करता था ।लेकिन मेल मिलाप,सादगी, ताजी हवा, स्वस्थ खान-पान, आदर सम्मान सब होता था। बस अगर कुछ नहीं था तो आधुनिक वस्तुएं नहीं थी ।आज की बात करें तो आज आश्चर्य और अद्भुत कर देने वाली सभी आधुनिक विज्ञानिक वस्तुएं हैं । और नई टेक्नोलॉजी है। लेकिन ना तो ताजी हवा ही और ना ही शुद्ध खानपान है । पुरानी संस्कृति और ना ही कुछ आदर मेल मिलाप अपना तत्व की भावना विद्यमान है । अगर कुछ है तो बस खोखला दिखावा है । दूर से संवेदना है ।  एक दूसरे के प्रति लापरवाही।  बदलते जमाने में बस यही रह गया है।

आज साल में सब के लिए एक-एक दिन निश्चित होता है ।जैसे वन दिवस, महिला दिवस, माता दिवस, पिता दिवस, प्यार मोहब्बत का दिवस, बाल दिवस, ब्लड दिवस आदि आदि । लेकिन क्या इन सब में एक दूसरे के प्रति लगाव दिवस है ।

एक दूसरे के प्रति लगाव दिवस 

एक बात याद आ गई, एक दिन सोलह 17 साल के बच्चे को डांटते हुए मैंने कहा था । अरे ! अपनी मां से कैसे बात कर रहे हो? तुम्हें अपनी मां का सम्मान करना चाहिए। उनका आदर करना चाहिए ।इसके उत्तर में बच्चे ने मुझे कहा था कि वह अपनी मां को बहुत प्यार करता है ।हर साल माता दिवस वह मनाता है ।माता दिवस पर अपनी मां को बहुत प्यार करता है ।उनको कार्ड और गिफ्ट खरीद कर देता है और यह कह कर वह चला गया। मैं समझ ही नहीं पा रही थी कि उसके इस उत्तर पर हंसो यह अफसोस मनाऊं। या फिर एक ऐसा भी दिवस होना चाहिए जो एक दूसरे के प्रति लगाव, संवेदनाएं और भावनाएं जुड़ी हो ।

वह अपना प्यार करनी और कथनी में करके दिखाते थे ।

खैर ! लेकिन मुझे अब धीरे धीरे समझ में आ गया था ।इस वैज्ञानिक पद्द में, हम अपने पुराने संस्कृत को खोते जा रहे हैं ।वह समाज लगभग खो दिया है ।जहां पर बच्चे अपने मां-बाप की आखरी सांस तक सेवा करते थे ।  उन्हें किसी दिन यह दिवस की जरूरत नहीं पड़ती थी , कि वह अपने लोगों को प्यार जताने के लिए किसी कार्ड या  गिफ्ट का सहारा ले , वह अपना प्यार करनी और कथनी में करके दिखाते थे । उनका प्यार तो सेवा भाव में ही उमड़  कर आ जाता था । उनका प्यार तो मान सम्मान और आदर भाव में ही लिपट कर रह जाता था ।

 

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