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दुनिया मे बहुत से ऐसे लोग हैं जो अपने आप को कम आंक कर दूसरों से तुलना करते हैं। खुद को बेहतर बनाने के बजाय दूसरों से खुद की तुलना करके, हीन भावना से ग्रसित हो जाते हैं। धीरे-धीरे अपने अंदर हजारों कमियां निकालने लगते हैं। जिस काम को भी वह करते हैं। उस से असंतुष्ट हो जाते हैं। उसे और बेहतर न कर पाने की वजह से दुखी हो जाते हैं। आत्मविश्वास की कमी होने के कारण व दूसरे के द्वारा लगाए गए कमियों को सही मानने लगते हैं। और सोचने लगते हैं कि वह दूसरों से बेहतर नहीं हो सकते हैं। कितनी अजीब बात है? अपनी कमियों को तो समझ जाते हैं कि वह दूसरों से बेहतर नहीं हैं लेकिन वह यह नहीं समझते कि अगला इंसान अगर उनसे बेहतर है तो वह किस वजह से उनसे बेहतर है, और उस वजह की पड़ताल किए बिना स्वयं को निराशा के गड्ढे में गिरा देते हैं। दूसरे की सफलता से सीखने के बजाय, अपनी कमियों को छुपाने में ज्यादा समय बर्बाद करने लगते हैं। तथा दूसरे की सफलता की तुलना अपनी नाकामियों के तर्क से जोड़ने लगते हैं। और फिर व्यर्थ में अपनी असफलता दूसरे के माथे पर मढ़ देते हैं और आसानी से अपने नाकामी छुपा ले जाते हैं।

इससे अंजाम यह होता है कि वह दूसरों से व स्वयं से भी झूठ बोलने लगते हैं कि वह बेहतर थे लेकिन किसी कारण की वजह से वह असफल हो गए और धीरे-धीरे अपने झूठ के जाल में स्वयं फस जाते हैं। जिसके कारण वह असफलता के दौर में चले जाते हैं। यहीं से झूठ का दिलासा देने का सिलसिला शुरू हो जाता है। झूठ चेहरे पर आ जाता है जो दूसरों को दिखाने के काम आता है। सच्चाई अंदर दब जाती है जो किसी को नहीं दिखती। इसी तरह असफलता का कारण भी दूसरे का दोष बन जाता है। जिसके कारण अपने से बेहतर इंसान से जलने, चिढ़ने व तुलना करने लगते हैं। खुद को बेहतर बनाने के बजाए दूसरों को नीचा दिखाने में समय बर्बाद करने लगते हैं।

Power की क्या अहमियत होती है

इस दुनिया में अनगिनत लोग हैं। सभी अनगिनत लोगों के पास अपनी शारीरिक और मानसिक शक्ति होती है। किसी के पास कुछ कम, तो किसी के पास कुछ ज्यादा शक्ति होती है, और कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो अपनी Power व शक्ति को समझ नहीं पाते हैं। कभी अपनी इच्छा से तो कभी दूसरे की इच्छा से अपना सारा जीवन बिता देते हैं। आखिर यह शक्ति क्या है? शक्ति वह गुण है जिसका स्वामी प्रत्येक व्यक्ति होता है। वह व्यक्ति अपने गुणों द्वारा शक्तियों को अर्जित करता है। उसकी शक्ति उसके गुणों के द्वारा ही चमकती हैं। प्रत्येक व्यक्ति की स्थिति उसके गुणों पर ही निर्भर करती है। उसके गुण ही उसकी power की उर्जा का आधार होते हैं।

इस दुनिया में दो तरह लोगों के पास power होती है। एक व्यक्ति जो बुरा करने में अपना समय लगाते हैं। दूसरा वह व्यक्ति जो दूसरे के भलाई में अपनी शक्ति लगाते हैं। फिर इन्हीं शक्तियों के आकलन से उन व्यक्तियों के गुणों द्वारा उनकी पहचान समाज में स्थापित होती है। इसी पहचान से वह अपने पावर को प्रदर्शित करते हैं।

शक्ति का इस्तेमाल मनुष्य दो तरह से करता है। एक तरह का मनुष्य शक्ति अपने गुणों द्वारा कमाते हैं। अपने power के आधार पर ही घर, परिवार व समाज में इज्जत का पात्र बनता है। दूसरे तरह का मनुष्य अपने शक्ति अपने पद द्वारा कमाता है। मनुष्य अपने इन्हें शक्तियों के इस्तेमाल करके जीवन के किसी भी कठिन रास्तों को पार कर खुद को सफल बनाने में सक्षम हो सकता है।

जब स्वयं का किसी दूसरे के द्वारा मजाक बनने लगे

जब कभी मनुष्य दूसरे के द्वारा मजाक का केंद्र बनता है तब वह मनुष्य बेहद दुखी हो जाता है उसके अंदर हीन भावना का जन्म हो जाता है। आत्मविश्वास की कमी हो जाती है। वह छोटी-छोटी बातों से चढ़ने लगता है। खुद को बोझ सा महसूस करने लगता है। नकारात्मक शक्तियां आसपास उसको घेरे रहती हैं तथा नकारात्मक की छांव में पलने और बढ़ने की वजह से वह चिड़चिड़ा हो जाता है।

जब किसी दूसरे के द्वारा मजाक का केंद्र बनने लगे तो सबसे पहले इंसान को स्वयं में आत्मविश्वास जगाने की जरूरत होती है तथा अपने लिए बेहतर करने की इच्छा को जागृत करने पड़ती है। इसे दूसरे के मजाक को गंभीर लेने के बजाय उसको हल्का लेकर उसे भी मजाक का लुफ्त ले लेना चाहिए तथा उसको यह पता करना चाहिए कि अगर अगला इंसान उसका मजाक बना रहा है तो वह वास्तविक है या झूठ।

वक्त भी किया झूठ से तात्पर्य यह है कि अगला इंसान सच में मजाक बना रहा है या आप की सफलता से चिढ़ कर आप के खिलाफ साजिश कर रहा है।

खुद को कभी कम नहीं आंकना चाहिए

मन की भावनाएं चाहे जैसी हो अगर किसी और से खुद की तुलना करने लगेंगे तो सबसे बड़ा दुखों का गड्ढा खुद के लिए खोद देंगे। जहां पर तुलना होती है। वहां पर व्याकुलता, जलन, बेचैनी उदासी, निराशा ही हाथ लगती है। अगर तुलना शब्द का भाव समझ लिया तो इसका सकारात्मक फल भी मिलता है। इस फल में खुशी, संतोष आगे बढ़ने का उत्साह आपके अंदर आने लगती है। जो आपके सारे दुखों का अंत करती है। आखिर मनुष्य एक दूसरे से तुलना करता ही क्यों है? तो इसका जवाब यही होता है कि जब मनुष्य अपने आप से अशंतोष होता है या कोई आप से बेहतर आपके सामने आ जाता है। तब तुलनात्मक जैसे भाव स्वयं उत्पन्न होने लगते हैं। जो आपको इनसिक्योरिटी का भाव महसूस कराते हैं। जिससे आपकी इनसिक्योरिटी को और बढ़ावा मिल जाता है। और अपने आसपास के बने माहौल से असुरक्षा महसूस करने लगते हैं।

इसका उपाय यही है कि मनुष्य सिर्फ वास्तविकता और सच के करीब रहे। जितना वह वास्तविकता को जानेगा, समझेगा उतना ही वह सच से वाकिफ होगा। महत्वपूर्ण बात यह है कि मनुष्य को वास्तविकता और सच में अंतर करना सीखना होगा और जब सच उसके पास होगा तो झूठ का अस्तित्व का नाश होगा और मन शांत होगा।

वास्तविकता और सच मैं क्या अंतर होता है

वास्तविकता क्या होती है, जैसे आपको पता है कि दूसरे इंसान में आप से बेहतर गुण हैं। इसीलिए वह आप से बेहतर है तो इस सच को जान कर अपने गुणों की वृद्धि करने पर ध्यान देना चाहिए। उदाहरण से समझते हैं कि आपको किसी ने मोटा कहां, और जो आपके सामने हैं वह पतला है तो आपको वास्तविकता और सच का ज्ञान होना चाहिए। पहले तो पता यह करना चाहिए क्या सच में आप मोटे हैं। अगर आप मोटे हैं, तो उस पर काम करना चाहिए ना कि अपने अवगुणों को अनदेखा कर दूसरों से जलना व चिढ़ना चाहिए।

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2 thoughts on “खुद को दूसरे से कम आंकना”
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