young woman in forest in daylight

बहुत लोगों से सुनते चली आ रही हूं कि औरतों का काम ही क्या है ? खाओ पियो, घर बैठो, आराम करो और जब थक जाओ, तो बाहर जाकर शॉपिंग कर लो। अब मै सोच डूबी हूं कि इस दुनिया में करोड़ों अनगिनत औरतें हैं। तो क्या यह सुविधाएं सच में औरतों को मिलती है। क्या सच में वह खाती पीती है, घर में बैठती हैं। आराम करती हैं। और जब थक जाती हैं तो क्या शॉपिंग जाती है। इस बारे में कुछ नहीं कह सकती। लेकिन हां ! खासतौर पर मैं उन औरतों की बात कर रही हूं जो घर पर रहती हैं। 24 घंटा परिवार के बारे में सोचती हैं। और अपने पति के साथ हर हालात में खड़ी रहती हैं।

पति को भगवान का दर्जा देना

हिंदुस्तान में तो औरतें पति को भगवान का दर्जा देती हैं। साल में न जाने कितने व्रत होते हैं। जो परिवार के लिए बने होते हैं। उनमें बच्चे, पति के लिए वह ना जाने कितनी बार पूजा-पाठ व व्रत करती है। और भगवान से अपने परिवार के लिए सलामती की दुआ मांगती है। इन सारे व्रत को निभाती है। लेकिन साल के कैलेंडर में कोई भी दिन ऐसा नहीं होता है, जो औरतों के लिए व्रत व सलामती के लिए कोई व्रत बना हो। फिर भी, बिना किसी से शिकायत किए वह दिन-रात अपने परिवार के लिए प्रार्थना करती रहती है। पढ़ी-लिखी से गवार तक सभी औरतें अपने पति धर्म को निभाती हैं।

औरत का घर ससुराल होता है

एक घर में, जहां लड़की का जन्म होता है। वह खेलती, पलती , बढ़ती है। ज़ब किशोरावस्था की उम्र पार करते ही, मां-बाप अपनी लड़की को दूसरे के हाथों में सौंप देते हैं। इस उम्मीद में कि उनकी बच्ची को घर से ज्यादा ससुराल में प्यार मिलेगा। मान सम्मान ओहदा मिलेगा और मिलता भी है। हिंदुस्तान में शादी एक पर्व की तरह मनाया जाता है। शादी कभी भी हो पर उसकी तैयारियां दोनों परिवार बहुत पहले से ही करना शुरू कर देते हैं।

लड़की से औरत बनने का सफर

हिंदुस्तान में शादियां दो लोगों के बीच में नहीं होती है। यहां पर शादियां दो परिवार, खानदान, मान सम्मान के बीच होती है। शादी के बाद एक लड़की औरत के रूप में गृह प्रवेश करती है। यहीं से उसके लड़की से औरत बनने के सफर की शुरुआत हो जाती है। औरत के रूप में ससुराल में उसका पहला कदम बढ़ जाता है। ससुराल मे एक लड़की, अब औरत के रूप में होती है। वह औरत पत्नी, बहू, भाभी, ननंद और ना जाने कितने रिश्ते को निभाती है। यहीं से असली परीक्षा औरत के लिए शुरू हो जाती है। औरत को अपने पति के साथ-साथ सास -ससुर, ननद, देवरानी, जेठानी तमाम रिश्तेदारों को दिल जीतना पड़ता है। उनके सभी सवालों पर खरा उतरना पड़ता है।

औरत मायका जैसे कोई स्कूल व ट्रेनिंग सेंटर

अब मुझे यह समझ में नहीं आता है कि एक अकेली औरत कैसे सबको खुश रख सकती है। जब खुश होने के बाद आती है तब उस औरत के चेहरे पर खुशी नहीं दिखाई देती है। क्योंकि उनको इतनी जिम्मेदारियां दे दी जाती है कि जैसे वह किसी घर से नहीं स्कूल या कोचिंग से ट्रेनिंग करके आई हो। जैसे मायका उसका स्कूल व ट्रेनिंग हो और कैसे जिम्मेदारियों को बखूबी निभाए इसकी पूरी डिग्री करके आई हो। ससुराल मैं इतने नियम कायदे बना दिए जाते हैं कि जैसे परंपराएं, सारे नियम कायदे, घर के कानून बस उस औरत पर ही लागू होते हैं।

दूसरे लोगों को फिर भी थोड़ी रियायत मिल जाएगी लेकिन घर की बहू को मजाल है कि कोई रियायत दे दी जाए।

औरत निभाती है अपनी जिम्मेदारी

शादी के बाद जब औरत सारी जिम्मेदारियां उठा लेती है। अपने बच्चों की परवरिश में लग जाती है। बिना थके, बिना रुके सारा दिन काम करती रहती है परिवार को संभालती है बच्चों को पालती है सबका ख्याल प्यार से रखती है परिवार और समाज को आगे बढ़ाने में मदद करती है जब सारी जिम्मेदारियां औरत निभाती है तब समाज में कैसे कोई औरत के प्रति निंदनीय बात कर सकता है कैसे औरतों के लिए गाली बन सकती है कैसे गाली में औरतों के रंग रूप व शारीरिक अपशब्द इस्तेमाल करके उस को नीचा दिखाया जा सकता है।

औरत तेरी यही कहानी

मां के अनुसरण करके बच्चा आगे बढ़ता है। समाज का निर्माण करता है। प्रगति होती है। एक मां अपने बच्चे के चेहरे पर मुस्कान लाती है। जब इतना सब औरत करती है, तो क्या यह सही है कि औरतों पर ही गाली बनाई जाए? क्यों औरतों का गालियों के रूप में अपमान किया जाता है अगर आपस में आदमी आदमी लड़ते भरते हैं तो क्यों औरतों को शामिल कर उनका सहारा लेकर अपना मुंह से गालियों के रूप में अपने प्रतिशोध को ठंडा किया करते हैं।बस औरत तेरी यही कहानी है।

पढ़े-लिखे से गवार तक समाज के सभी सभ्य लोगों से मेरा सवाल है। कि क्या कोई अपनी रंजिश में, औरतों पर तंज कस सकता है। कैसे कोई उन पर बनी गंदी गालियों को बढ़ावा दे सकता है। नाजुक और कोमल का हृदय रखने वाली औरत को कोई कैसे इतने भद्दे और गंदी गालियां परोस सकता है। पुरुषों की बात बात में य आपसी लड़ाई झगड़े में कैसे कोई औरतों का अपने गाली के रूप में सहारा ले लेकर अपने रंजिश को पूर्ण कर सकता है।

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पुरुष की शिक्षा – दीक्षा और सारी हेकड़ी तब निकल जाती है, जब गाली भी औरतों का सहारा लेकर दी जाती है, गुस्सा निकालने के लिए भी मां -बहन का सहारा चाहिए। लाचार !! गाली भी अपनी नहीं बना पाते ।। 🤔

अगर झूठी समाज में शान ना होती, तो ना जाने कितनी लड़कियां मरने से बच जाती, अगर समाज में पुरुषों में संस्कार होते, तो ना जाने कितनी लड़कियां बलात्कार से बच जाती।

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