person on a bridge near a lake

अकेलापन अपने आप में सारी खामोशियों को समेटे हुए है। अकेलेपन के शब्द से समझ में आ जाता है कि अकेलापन कितना तनहा है। एक अकेला मनुष्य लोगों के जमावड़े में भी कितना अकेला होता है।

अकेलापन क्यों होता है

एक अकेला इंसान अपने आसपास के लोगों से घिरा हुआ है। तो इसका यह मतलब नहीं है कि वह अंदर से तन्हा नहीं है। सब कुछ उसके पास होता है। फिर भी वह अकेलेपन से डरता है।अगर उसके पास सुखदाई जीवन हो, मौसम हो , वादियां हो , सारी यारियां भी हो , लेकिन सूनापन हो तो इन सब चीजों का क्या मतलब रह जाता है। यही सुनापन, अकेलापन को खाता रहता है। खाली बेंच पर अकेलापन बैठा होता है। दूर तक सिर्फ और सिर्फ अकेलापन होता है। अकेले पन का शिकार बहुत से लोग होते है। जो इस अकेलेपन से जूझ रहे होते है । आज का यही टॉपिक अकेलेपन के सार की व्याख्या करेगा।

जिंदगी अकेली होती है लेकिन साथ मांगने के लिए हमेशा हाथ फैलाए रहती है। अकेलापन इतना डरावना होता है कि कोई भी इस में नहीं रहना चाहता है। लेकिन जिंदगी और नियति का खेल यही होता है कि सारे अनुभव के रंग, एक छोटी सी जिंदगी में दिखाई देती है। जायदातर सभी लोग, जिंदगी के कुछ कड़वे अनुभव से डरते हैं। लेकिन सच्चाई तो यही है कि यही कड़वे अनुभव हमें तोड़कर और मजबूत बनाने की हिदायत देते हैं। जिंदगी जितनी भी ठोकरे देती है। जिंदगी जीने के हौसले उतने ही मजबूत करती जाती है।

कहते हैं कि इंसान जितना ही अंदर से टूटा होगा। वह उतनी ही दुगनी मजबूती से आगे बढ़ेगा और हर एक चुनौती जंग की तरह लड़ने के लिए तैयार होगा।

परिस्थितिया अकेलेपन का शिकार होती हैं

जिंदगी की उम्र चाहे जो भी हो, अकेलापन सभी तरह की उम्र के लोगों को अपना शिकार बनाता है। बस थोड़ा सा अंतर यह होता है की बस, सब की स्थितियाँ अलग-अलग होती हैं । जिंदगी के ऐसे ऐसे मोड़ आते हैं कि जहां अकेलापन अपना तंबू गाड़े बैठे रहता है। और फिर हम लोग अकेलेपन का सफर तय करने लगते हैं। कोई प्यार के अकेलेपन में होता है, तो कोई दुख के अकेलेपन में होता है, किसी के विचारों में तालमेल नहीं बैठा पाना या विचारों के मतभेदों की वजह से अकेला हो जाना, तो किसी के साथी आधे सफर में उसको अकेला छोड़ कर चले जाना, सभी वज़ह अकेलेपन का सबब होती है। सभी अकेलेपन के कारक अलग-अलग होते हैं। लेकिन उपस्थित सिर्फ एक अकेलापन की होती है।

देखा जाता है कि अक्सर प्यार के सफर में तनहाई बहुत लोगों को कष्ट दे जाती है। प्यार के सफर में, अकेलेपन व्यक्ति स्वयं चुनता है अधूरे प्यार में अक्सर व्यक्त अकेलेपन का जिम्मेदार होता है। धीरे-धीरे व्यक्ति स्वयं अलग-थलग पड़ने लगता है। और इस तरह से वह अकेलेपन का शिकार हो जाता है।t

प्यार के सफर मे अकेलापन

प्यार के सफर में तनहाई का चुनाव स्वयं करते हैं क्योंकि ज्यादातर देखा जाता है कि प्यार के अनुभव में अक्सर हम अपने प्यार पर निर्भर हो जाते हैं। उस निर्भरता की वजह से अपने अस्तित्व में हम समीप आने लगते हैं परिणाम क्या होता है कि अपने प्यार को खोने से डरने लगते हैं या उस पर निर्भरता इतनी बढ़ जाती है कि उसके बगैर जीने की कल्पना से भी डरने लगते हैं यही डर हमें और अपनी तरफ अंधकार में ले जाता है। यह अधिकार सिर्फ नकारात्मक ऊर्जा दे सकती है। और यही नकारात्मक उर्जा हमें अकेलेपन की तरफ धकेल देती है। और ना चाहते हुए भी हम अकेले पन का शिकार हो जाते हैं।

प्यार पर निर्भर हो जाना

लेकिन अक्सर हम यह भूल जाया करते हैं कि निर्भरता केवल कमजोर नहीं हिम्मत भी बनती है। जहां पाने की उम्मीद होगी वहां खोना भी जायज होगा। अक्सर प्यार में यही गलती होती है कि हम अपेक्षाएं ज्यादा करते हैं और अपनी जिंदगी दूसरे के हिसाब से ढालने की कोशिश करने लगते हैं। दूसरे के विचारों से व्यक्तित्व बदलने लगते हैं। धीरे-धीरे अपनी पहचान खोने लगते हैं। जिसकी वजह से हम कब असली से नकली हो जाते हैं। पता ही नहीं चलता और जहां नकली अस्तित्व होता है। वहां पर एक ना एक दिन अकेलापन जरूर आता है। अपने ही बनाए जाल में फंस जाते हैं। अकेलेपन के न्योता दे बैठते हैं। झूठ के अस्तित्व से कभी प्यार नहीं टिकता है।

अगर हर इंसान में कुछ कमियां होती हैं। तो कुछ अच्छाइयां भी होती हैं। या खुद पर निर्भर करता है कि हम क्या उसमें देखना चाहते हैं कभी भी एक साथ यह दोनों चीजें विद्यमान नहीं हो सकती हैं इसलिए हमेशा सच को अपने साथ रखना चाहिए सच आपको जीने की राह दिखाएगा और झूठ, व्याकुलता, तनहाई, अकेलापन, उदासी यह सब देगा।

अकेले होने से इंसान डरता क्यों है? जबकि इंसान हर कदम पर अकेला होता है। अपने हिस्से के सारे कर्म उसको खुद करने पड़ते हैं । फिर भी इंसान अकेलेपन से डरता है। सब कुछ जानते हुए भी कई कारणों को समझते हुए भी, वह अकेलेपन से भागता रहता है।

इंसान अकेलेपन से इसलिए डरता है। क्योंकि अकेलापन अपने साथ ढेर सारी नकारात्मक उर्जा लिए होता है। अकेलापन तमाम आशंकाओं को जन्म दे देता है और प्रिय ही आशंकाएं विचारों में गोते लगाने लगती हैं। व्याकुलता, नीरसता, तनहाई जिंदगी में भर देती है शायद यही रास्ता अवसाद (depression)की तरफ होकर जाता होगा।

अकेलेपन से नकारात्मक का धुआं उठता है

लेकिन अगर सारे नकारात्मक ख्यालात अपने दिमाग से निकाल दिया जाए और सकारात्मक सोच अपने आचरण में भर दिया जाए। तब अकेलेपन से भी बहुत मजा आएगा। फिर चाह कर भी अकेलेपन से नहीं डर पाएंगे। जिस चीज पर आपका कंट्रोल ना हो उस पर कभी भी हक नहीं जताना चाहिए।

एक बेहतर सुकून के लिए हमेशा जिंदगी को सफलता से जीने की कोशिश करनी चाहिए। जो जैसा है, उसको वैसा ही स्वीकार करना चाहिए। कभी भी अपनी इच्छा के लिए दूसरे के व्यक्तित्व से छेड़छाड़ नहीं करना चाहिए। जिंदगी में मजा तो तब है, जब जिंदगी अकेले में सुकून दे जाए। इसलिए कभी भी अकेलेपन से नहीं डरना चाहिए। यह वही समय होता है। जब अपने आप को जानने का बेहतर मौका मिलता है। अपनी इच्छाओं को पूरा करने का समय होता है। सकारात्मक ऊर्जा को चारों तरफ बिखेरने का मौसम होता है।

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2 thoughts on “अकेलेपन से(क्यों डरते हैं?)”

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