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क्या अकेले रहने पर खुश हो सकते हैं ? क्या सच में अकेले रहने पर खुशी मिल सकती है। यहां पर अकेले रहने का मतलब है आप, सिर्फ और सिर्फ आप, खुद हो। वहां पर कोई और ना हो। क्या हम अपने जीवन में सुख-दुख, हंसी -मजाक, क्या अकेले रहकर जिंदगी के सारे लुफ्त ले सकते हैं। अगर यही बात कई हजार साल पहले की बात होती, तो यह असंभव हो सकता था। क्योंकि तब रिश्तो की अहमियत होती थी। आपस में घुलना मिलना जानते थे। साथ बैठकर सुख-दुख बाटते थे। उस वक्त बड़े बूढ़ों की चारपाई कभी खाली नहीं होती थी, कोई ना कोई आकर उनसे बैठकर हजारों बातें किया करते थे। आजकल के माहौल की तरह वृद्धाश्रम का दरवाजा नहीं खोल देते। उस वक्त अकेले रहने की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। क्योंकि तब रिश्तो का इतना महत्व होता था। कि हर तीज त्यौहार पर रिश्तेदारों का मेला सा लग जाता था। हाथ जोड़कर नमस्ते होता था। पैरों पर झुककर बाकायदा उनका आदर सम्मान, उनका प्रणाम किया जाता था। रिश्तो को निभाया जाता था। उनको दिल से जिया जाता था। जो अब अकेले रहने की प्रथा ने धीरे-धीरे सब खत्म कर दिया है।

दूर के रिश्ते अति प्यारी

कंप्यूटर युग, मोबाइल युग ने रिश्तो को दूर कर दिया है। हालचाल तो ले लिया जाता होगा, लेकिन बस फोन पर। आज के युग में मोबाइल हर इंसान की कमजोरी बन गई है। अकेले रहकर भी मनुष्य अकेले नहीं होता है। उसके साथ मोबाइल होता है। मोबाइल उसका अब गहरा मित्र व साथी बन गया है। जिसके कारण वह मोबाइल यंत्र के बेहद करीब और अपनों से बेहद दूर होता चला जा रहा है। यह इंटरनेट सुविधा अकेले में मगन रहने की सीख दे रहा है। फोन पर मेल मिलाप बढ़ रहा है। लेकिन सच्चाई तो यह है कि वास्तविक तौर पर लोग अपनों से बहुत दूर होते जा रहे हैं। मोबाइल हमें सीख देता है कि दूर के रिश्ते अति प्यारे होते हैं। इन रिश्तो को सुबह शाम उनका अभिनंदन करना। हाल-चाल पूछना बिना झिझक ढेर सारी बातें करना। छोटी सी छोटी बातों का ध्यान रखना। मोबाइल पर बने रिश्तो को आजकल दुनिया बहुत सहेज कर रखती है। सामने वाले की हर चीज की भावनाओं का ध्यान अच्छे से रखती है। मोबाइल पर बने रिश्तो की हर सेकंड की जानकारी होती है जैसे ही सामने से महसूस प्रस्तुत होता है उसका रिप्लाई तुरंत दिया जाता है। भले ही वास्तविक जिंदगी में ऐसा ना हो आसपास के वास्तविक रिश्तो को हल्के में ले लिया जाता है

अकेले रहने पर खुशी

आज दुनिया भर में कुछ लोग अकेले होने पर ज्यादा खुश होते है। अकेले होने पर ना कोई दबाव रहता है, ना कोई चिंता रहती है। इसी तरह से मनुष्य धीरे-धीरे अपनों से दूर होता जा रहा। रिश्ते अब फीके के पड़ने लगे हैं। आजकल के लोगों के पास ना कोई लक्ष्य है और ना ही कोई प्रतिस्पर्धा। क्योंकि हर इंसान आजकल अकेले खुश हो सकता है अगर उसके पास उसका मोबाइल ना हो तब वह उदासी को महसूस करेगा मोबाइल अब बदलती दुनिया का लाइफ पार्टनर बन गया है मोबाइल ने मनुष्य के जीवन मैं अपनी जगह मजबूत बना कर रखी है।

मोबाइल रिश्तो को कर रहा है दूर

सच तो यह है कि हम लोग नाम के लिए बस दुनिया से जुड़ रहे हैं अलग-अलग लोगों से बात कर रहे हैं लेकिन आज खुद खोखले होते जा रहे हैं वर्तमान की सोच तो यही होती है कि मोबाइल ही सब कुछ है। मोबाइल पर तो सब कुछ शेयर हो जाता है मैसेज हो जाता है स्माइली तक भेज दी जाती है। अपनी भावनाओं को बांट देते हैं। लेकिन बिना फोन के लोगों का हाल तो यह है कि जैसे उनको जानते ही नहीं है। वास्तविक सच्चाई यह है कि बस फोन के दिखावटी पन से दुनिया की खुशियां बटोर रही। है लेकिन अंदर से तो बहुत खाली है धीरे धीरे अंदर से कितने अकेले होते जा रहे हैं दूर को रिश्तो को जिनको जानते भी नहीं है। उनका खबर रोज लेते हैं लेकिन जो पास के रिश्ते हैं जो नाजुक पौधे के समान है उन रिश्तो को पानी ही नहीं डाल पाते हैं।

उदासीनता मन को दुखी करता है

अब बात करते हैं उदासीनता की तो उदासीनता जीवन के हर मोड़ पर खड़ा मिलता है। यह एक ऐसा भाव है जिससे चेहरे पर तो हंसी गायब हो जाती है। कुछ अच्छा नहीं लगता है। मन उदास हो जाता है। किसी कार्य को पूरा करने में मन नहीं लगता है। किसी भी चीज के लिए किसी काम के लिए उत्साहित नहीं होता है जब यही धारणा कर लेते हैं

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One thought on “जिंदगी के अकेलेपन का सफर”

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