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जिस से उम्मीद हो अगर वही दिल दुखा दे तो पूरी दुनिया से भरोसा उठ जाता है। उम्मीद एक जरिया है जो जिंदगी के कठिन परिस्थितियों का मरहम होता है। इसलिए सबसे बड़ा दुख होता है, तकलीफ होती है।

जब उम्मीद का टूटना ही होता है, तो उम्मीद ही क्यों होती है? क्यों हम किसी से उम्मीद कर बैठेते हैं? जबकि उम्मीदों का टूटना ही दुखों का कारण होता है? आश्चर्य ! की बात यह होती है कि उम्मीद भी अपनों से की जाती है। गैरों से तो हाथ जोड़कर नमस्ते किया जाता हैं। गैरों से कोई शिकायत नहीं होती है क्योंकि उनसे कोई उम्मीद नहीं होती है। उम्मीद वही होती है जहां आस होती है।

इच्छा से ही उम्मीद का जन्म होता है

उम्मीद एक ऐसी घटना होती है। जिसका जन्म मनुष्य स्वयं करता है। इसका तात्पर्य यह है कि जब मनुष्य के अंदर कोई इच्छा जन्म ले लेती है। तब वह उस इच्छा पूर्ति के लिए अपना रास्ता उम्मीद से होकर बांधने लगता है। अपनी इच्छा को पूरा करने के लिए मनुष्य दूसरों के सहारे की उम्मीद लगाने लगता है। और जिस वक्त मनुष्य के दिमाग में इच्छा पूर्ति के लिए उम्मीद का जन्म होता है, तो दुर्भाग्य से, जिससे मनुष्य उम्मीद लगा कर बैठता है। उससे अपनी उम्मीद के बारे में कोई जानकारी उस मनुष्य को नहीं दी जाती है। जिससे मनुष्य अपनी इच्छा पूर्ति के लिए उम्मीद लगाता है। जो दुख का कारक होता है।

इच्छा ही उम्मीद का कारण होता है

अपनी इच्छा का जन्म व्यक्ति ने स्वयं किया। लेकिन इस इच्छा की पूर्ति के लिए उसने उम्मीद दूसरे की लगा कर रखी और जब उसने उम्मीद लगा कर रखी, तो उसके बारे में उस इंसान को कोई जानकारी दिए बिना, उस से अनुमति लिए बिना , उससे उम्मीद लगाकर बैठ जाया जाता है। जो मुझे लगता है, यह गलत है। जो बाद मे दुख का कारण बनता है।

जब वह उम्मीद उसके सामने जागृत होती है। और ज़ब वह उम्मीद पर खरा उतरने में खेद व्यक्त करता है। तब वह उम्मीद चकनाचूर हो जाती है। उम्मीद खत्म हो जाती है। वक्त गंभीर बन जाता है। रिश्तो में दरार आ जाती है और दुखों का पहाड़ टूट पड़ता है। आंखों से आंसुओं की धारा बहने लगती है। यह सब सिर्फ इसलिए होता है क्योंकि बिना अनुमति के उम्मीद लगाना जैसे ठोकर खाने के बराबर होता है।

यह वास्तविक सत्य है। अगर सब कुछ मिट जाता है या सब कुछ ख़त्म हो जाता है। तो मनुष्य उसको फिर से बना लेगा या फिर से बनाने की कोशिश में जुट जाएगा। लेकिन अगर उम्मीद खत्म हो जाती है। तब आंखों के सामने अंधेरा छा जाता है। एक उम्मीद ही होती है। जो आपके बुरे वक्त का सहारा होती है।

उम्मीद क्या होती है

जब हम किसी से अपेक्षा करते हैं। अपनी उम्मीदों को माला पिरोने लगते हैं। सब कुछ तय कर लेते हैं और जिस से उम्मीद लगाकर रखते हैं। उस पर उम्मीदों का विस्फोट कर देते हैं । सिर्फ इसलिए कि वह मेरा अपना है। करीबी है। तो यहां पर एक चीज़ समझ नहीं होती है कि हमेशा उम्मीद दो तरह की होती है। एक जो स्वयं से उम्मीद करते हैं। दूसरा वह जो दूसरों से उम्मीद लगाते हैं। स्वयं से उम्मीद रखने वाला व्यक्ति हमेशा सफलता पाता है। इसलिए क्योंकि उसको उसकी जिम्मेदारी स्वयं उठानी होती है। उम्मीद के लिए वह आत्मनिर्भर होता है।

जब उम्मीद स्वयं से रखता है, तो उम्मीद की टूटने की गुंजाइश नहीं होती है। लेकिन जब यही पर उम्मीद वाह दूसरे के सहारे पर लगाते हैं। तो वह दूसरे पर निर्भर हो जाता हैं। तब यही उम्मीद को टूटने का खतरा ज्यादा बढ़ जाता है। दूसरों से लगाई गई उम्मीद का टूटना ज्यादातर पीड़ादायक होती है। जब उम्मीद पर खरा नहीं उतरता है कोई, तो इससे दिल टूटते हैं, रिश्ते टूटते हैं, संबंध खराब होते हैं। इसी जगह पर स्वयं से उम्मीद रखने वाला व्यक्ति प्रगति की ओर आगे बढ़ता है। दूसरों के अंदर उम्मीद जगाता है। दूसरों का सहारा बनता है।

स्वयं से उम्मीद लगाना

इसलिए उम्मीद हमेशा स्वयं से करनी चाहिए। स्वयं से उम्मीद करने पर किसी से भरोसा नहीं टूटता है। दिल नहीं दुखता है। और स्वयं से उम्मीद लगाने में सबसे बड़ी बात यह होती है कि जब यहां उम्मीद टूटती है, तो फिर से उम्मीद का जन्म हो जाता है। पहले से कहीं ज्यादा दुगनी हिम्मत से इच्छा पूर्ति के लिए काम किया जाता है। वह कहते हैं ना की जितनी उम्मीद टूटती जाती है, हिम्मत उतनी ही बढ़ती जाती है। स्वयं से उम्मीद लगा कर तो देखो, मंजिलें ऊंचाई तक ले जाती हैं

बड़े कमजोर होते हैं, वह लोग जो आंसुओं में बह जाते है।

मध्यमाम में होता कुछ नहीं

फिर बंद कमरों में, अवसाद को क्यों सह जाते हैं

जब सब कुछ नश्वर है, तो रोना किस बात का है।

जब कल नहीं बचा तू, आज की क्या औकात है।

संघर्ष करो, आगे बढ़ो, दुख की क्या बिसात है ।।

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One thought on “उम्मीद (HOPE)”

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