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नामोनिशान मिटा कर राह बनाई,

आज वह मुझसे मेरी मंजिल पूछते हैं!!

खुद को खोकर एक छाँव बनाई ,

आज वह मुझसे मेरी पहचान पूछते हैं!!

उम्र गुजार दी इस घरौंदा में,

आज मुझसे सब मेरा नाम पूछते हैं!!

प्यार इश्क और मोहब्बत का यह मेरा दूसरा भाग है। पहले भाग में कुछ बातें छूट गई थी, तो सोचा इस भाग में पूरा कर दू।

प्यार, इश्क और मोहब्बत

यूं तो जीवन की राह बहुत कठिन है, लेकिन प्यार के साथ इसके रास्ते कुछ आसान हो जाते हैं। खुशी के पल मिल जाते हैं। जीने का उद्देश बन जाता है, और लंबा सफर कब कट जाता है, पता ही नहीं चलता। पिछले भाग में प्यार की बहुत ढेर सारी बातें की, जैसे प्यार क्या है? सच्चा प्यार क्या है? वगैरा वगैरा। आज फिर इसी के बारे में कुछ बातें करते हैं। प्यार एक खूबसूरत एहसास तो है, लेकिन इस एहसास के साथ ढेर सारी जिम्मेदारियां भी है। खैर !आजकल का प्यार क्या होता है? थोड़ा इस पर विचार केंद्रित करते हैं।

प्यार में खामोशी

प्यार में खामोशी हो तो अच्छी बात है, लेकिन यह खामोशी कौन सी होती है, किसी तूफान आने से पहले की खामोशी होती है या किसी तूफान जाने के बाद की खामोशी होती है। इस पर चर्चा तो अभी करेंग लेकिन इसको दो तरीके से समझ सकते हैं।

प्यार में खामोशी का पहला बिंदु

पहला बिंदु, यह है कि प्यार में दो लोग होते है, वह एक दूसरे के बारे में इतना कुछ जानते व समझते हैं कि, वह एक दूसरे की बातें बिन बोले ही समझ जाते हैं। दोनों लोग एक दूसरे को इतना समझ चुके हैं कि बस एक दूसरे की मुस्कुराहट से ही उनका सारा दिन काम चल जाता है। यहां पर दोनों में, आपस मे, एक दूसरे से शिकायत नहीं होती। इसके विपरीत वह अपनी-अपनी जिम्मेदारियो को एक दूसरे पर ना थोप कर, एक दूसरे के लिए समान व्यवहार, एक दूसरे की गरिमा का पूरा ख्याल रखते हैं। लेकिन अफसोस तो यह है कि यह सिर्फ कुछ ही लोगों में होता है। क्योंकि दुनिया में अब प्यार तो बहुत है, लेकिन प्यार के साथ अब लालच, अपेक्षाएं, उम्मीदें और जरूरते भी जुड चुकी है। फिर यही प्यार उनका बेवफाई का रूप धारण कर हवन मे स्वाहा हो जाती है।

प्यार में खामोशी का दूसरा बिंदु

दूसरा बिंदु है कि, जो दो लोग जीवन में साथ रहने की कसमें खाए थे।लेकिन उनके बीच ना चाहते हुए भी खामोशी आ जाती है। परन्तु प्यार के बीच इतनी जिम्मेदारियां होती हैं, कि उनको एक दूसरे से बात करने का वक्त नहीं मिलता। मैंने बहुत से परिवार में देखा है की एक दूसरे से प्यार मोहब्बत तो बहुत है। लेकिन एक दूसरे के साथ वक्त बिताने का मौका नहीं है। दो लोगो का रिश्ता अब लोक, लज्जा व जिम्मेदारियों के बोझ तले दब गया है। भारतीय महिलाओं के पास घर, आंगन, बड़े- बूढ़े सास – ससुर, बच्चे, परिवार, नाथ – रिश्तेदारों में सुख सुविधाएं और वह जिम्मेदारियों में इतनी उलझी रहती हैं, कि वह कब बहू से सास बन जाती हैं, उन्हें खुद ही पता नहीं चल पाता है।

अनुभव को साझा करना

शायद ठीक भी है, क्योंकि इतनी जिम्मेदारियों के बलबूते से वे अपने परिवार बच्चों पर पूरा ध्यान दे पाती हैं। लेकिन यह भी सच्चाई है कि इन सब में वह स्वयं कहीं खो जाती हैं। एक छोटी सी कहानी प्रस्तुत है, जो बहुत ही रोचक व प्रचलित है। मैंने जब यह कहानी सुनी थी, तो मैं भी सोच में डूब गई थी। आज इसी अनुभव को साझा कर रही हूं।

एक गांव में एक शहर से व्यक्ति पहुंचता है। वह व्यक्ति बूढ़ी दादी से बात करते-करते, दादी से नाम पूछ लेता है। चलिए अब यह कहानी शुरू करते है।

व्यक्ति- दादी आपका क्या नाम है?

दादी- बचवा ! हमको नाम याद नहीं, हम भूल गए।

व्यक्ति- क्या ? (अचंभित ! स्वर में)

दादी- हां, भूल गए।

व्यक्ति- कैसे आप अपना नाम भूल गए? आपको कुछ तो लोग कह कर बुलाते होंगे।

दादी- हां, जब मैं छोटी थी, तो हमारे माता-पिता हमको छूटकी -छूटकी कहकर बुलाते थे। शादी हुई, उसके बाद हम को सब बड़की- बड़की कहकर बुलाने लगे और जब ‘कल्लू ‘पैदा हुआ, तो सब ‘कल्लू की अम्मा’ कहकर बुलाने लगे। अब चुकि मैं बूढ़ी हो गई हूं, तो सब दादी कहकर बुलाने लगे। आज तक नाम तो किसी ने पूछा नहीं और जब पूछा ही नहीं, तो याद करने की जरूरत ही महसूस नहीं हुई। सो हम भूल गये ! पता नहीं मेरे माता पिता ने क्या नाम रखा होगा।

व्यक्ति- कुछ देर सोच कर बोला, दादी तुम्हें देख कर इस बात पर यकीन हो गया, कि एक औरत के कितने रूप हो सकते हैं। एक औरत अपना नाम खोकर, कैसे दूसरे के नाम को जीवंत करती है, और अपनी जिम्मेदारियों को सफलतापूर्वक निभाती है।

अच्छा है। बहुत अच्छा है, लेकिन अगर इस दादी को अपना नाम याद रहता, तो कितनी अच्छी बात होती, उसकी अपनी पहचान होती। पूरी जिंदगी जो उसने अपने कर्म किए हैं, वह तो इन चरणबद्ध नामों में बट गया। मेरा मानना है कि हर औरत की अपनी पहचान होनी चाहिए। क्या आप इससे सहमत हैं? अगर आप सहमत हैं, तो लाइक करिए।

नामोनिशान मिटा कर उनकी राह बनाई,

आज वह मुझसे मेरी मंजिल पूछते हैं!!

खुद को खोकर एक छाँव बनाई ,

आज वह मुझसे मेरी पहचान पूछते हैं!!

Disclaimer – यहां पर लिखी सभी post किसी भी धर्म, मानवता के विपरीत नहीं है। यह केवल सिर्फ मेरे विचार हैं। जो केवल reader को अपने विचारों से अवगत कराना है। मेरे विचारों से सहमत होना या ना होना यह उनके विचारों पर निर्भर करता है। यहां जो भी कंटेंट है उसके सारे copyright, neetuhindi.com के हैं।

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6 thoughts on “प्यार और पहचान”

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