बेटी थी उसको दमाद बियाह करके ले गए, बेटा था उसको बहू ले गई। आज मेरा घर कहने को घर है लेकिन बस चार दीवारों का मकान है, जहां हम बुड्ढे बुढ़िया के अलावा कोई नहीं रहता, घर तो बच्चों से होता है, बच्चे एक नहीं दो-दो है लेकिन मेरे पास कोई नहीं, शायद यही जिंदगी है और इस जिंदगी का चक्र के हिस्सा हम है। “

बुढ़ापे की व्यथा

यह व्यथा वह है। जो मैंने एक बुजुर्ग महिला से सुनी थी, इस व्यथा का दर्द वही जान सकता है, जिसके बच्चे तो हैं मगर उनके साथ नहीं रहते।

कितनी दुख की बात है जब बच्चा छोटा होता है तो मां का आंचल नहीं छोड़ता और जब थोड़ा बड़ा होता है तो बाप की जेब नहीं छोड़ता लेकिन जैसे धीरे-धीरे बड़ा होता जाता है, वैसे ही धीरे-धीरे सारे रिश्ते निभाना छोड़ता जाता है।

ज़ब हम छोटे होते है तो होली, दिवाली, रक्षाबंधन, तीज त्यौहार हम सब के साथ मनाते हैं, लेकिन पता नहीं क्यों ? बड़े होने पर यह सारे मन के भाव कहां लुप्त हो जाते हैं । क्यों इतना बदल जाते हैं?, कि पीछे मुड़कर नहीं देखना चाहते, यह किसकी रणनीति हो सकती है, समाज की, प्राकृतिक की, परवरिश की, या फिर पश्चिमी चलन की।

अजीब हवा चल रही है, आजकल की पीढ़ी को space चाहिए और कमाल की बात यह है कि यह सिर्फ अपनों से दूर रहकर मिलती है। वह भी अपने मां-बाप से जिन्होंने अपने बच्चे को बचपन से लेकर अब तक कभी अकेला नहीं छोड़ा।

बुढ़ापे का दर्द बहुत विदारक है

यह मेरा लेख किसी भी अच्छे बुरे लोगों के मतभेदों को जन्म नहीं देता और ना किसी विषय का आकलन करता है, यह सिर्फ महसूस किया गया विचार है, जो कलम बनकर उभरा है, बुढ़ापे का दर्द बहुत विदारक है क्योंकि इसका दर्द सिर्फ वही जान सकता है जो बुढ़ापे को भलीभांति जी चुका हो, वह बच्चे बड़े होकर कितने निर्मम हो जाते हैं जो अपने मां-बाप को बोझ की तरह ढोने लगते हैं और अपने मां-बाप के द्वारा किया गई उपकार, प्यार दुलार सब भूल जाते हैं।

बुढ़ापा (अंतिम पड़ाव)

कहते हैं कि प्रलोभन एक ऐसा आभूषण है, जिसको धारण कोई नहीं करना चाहता परंतु यह आभूषण होता सबके पास है। जब कोई इच्छा प्रकट होती है तब उस वक्त यह आभूषण धारण करने का मनुष्य विचलित हो उठता है और लोभ कि तरफ अग्र हो जाता है । सुखी जीवन की चाह रखना कोई गलत बात नहीं परंतु अपनों से अलग रहना उनके बगैर खुश रहना यह सब कितना स्वार्थीपन है क्योंकि जीवन के अंतिम पड़ाव पर सबके साथ रहने की तीव्र इच्छा, जीवन को बेचैन कर देने वाली होती है।

कितनी अजीब बात होती है जब हम बच्चे होते हैं तो सब के दुलार से घिरे होते हैं और जब जवान होते हैं तब दुगनी , तिगुनी तादाद से लोगों के संपर्क में रहते हैं और जब बूढ़े होते हैं तो यह संख्या धीरे-धीरे घटते – घटते दस से बारह हो जाती है, और आखिर में जब बुढ़ापा गहराता है, जब बूढ़ों को सब से मिलने बैठने बात करने की इच्छा होती है , तो आश्चर्य कि बात है कि तब यह संख्या बूढ़ों कि चारपाई तक आते-आते ना के बराबर होती है।

खुद के बच्चे जब पास नहीं रहते

बुढ़ापा जीवन का सबसे कठिन संघर्ष काल होता है, जब यह पता चलता है कि स्वयं के बच्चे अब दूर भागते है, जीवन को कोसने लगते हैं या अपने से दूर रखने की बात करते हैं, तब यह दर्द बढ़कर मन को रोज कचोटता है, ऐसा नहीं है कि इस पीड़ा का कोई अंत नहीं , यह दर्द जीवन को खोखला कर आत्मा को शरीर से अलग करने की सीढ़ी बन जाता है।

साथ गुजारे पालो को याद कर जीवन जीने लगते

जब बच्चों को अपने साथ रहने का प्रयास विफल हो जाता है तो माँ बाप के पास उनके साथ गुजारे पालो को याद कर जीवन जीने लगते है

सारी तपस्या, बलिदान या धर्म बच्चों को बड़ा करने में लगा देते है, बेटी हो या बेटा दोनों को मां एक सामान प्यार करती है और एक सामान फलता – फुलता देखना चाहती है, फिर बेटी की विदाई पश्चात क्यों एक मां अपनी बेटी से कोई आशा नहीं रख सकते, और अगर बेटी भी अपने मां-बाप के लिए कुछ करना चाहे तो क्या वह कर सकती है।

बुढ़ापा अकेले ही काटा जाता है, क्योंकि बेटियां पराई और बेटा बहू के साथ पराया हो जाता है

अब वह दौर चल रहा है जहां साथ का मतलब कुछ घंटे समय बिताना का होता है साथ रहने का नहीं , अब वह दौर है जहां बच्चे अपने मां बाप को वृद्ध आश्रम में छोड़ आते हैं। अपने से दूर कर देते हैं। वृद्धाश्रम में पड़े मां – बाप का दर्द इतना गहरा होता है कि उसमें दुनिया के सारे गम समा जाएं, फिर भी वह कम होता है। मां-बाप सच में भगवान होते हैं बच्चों द्वारा किए गए सारे गलत कामों को माफ कर उनकी तरक्की और सेहत के लिए हमेशा प्रार्थना करते हैं।

अच्छे लोग भी होते है

दुनिया में बुराई से ज्यादा अच्छाई की तादात है । जितने जीवन मै काटे नहीं होंगे, धरती पर उससे ज्यादा फूल होंगे, शायद इसीलिए हर फूल में कांटे नहीं होते ठीक उसी तरह आज भी जीत अच्छाई की होती है, और हारने के लिए बुराई खड़ी रहती है, इसीलिए दुनिया मै बहुत ढेर सारे लोग ऐसे भी हैं, जो अपने मां-बाप कि सेवा श्रवण बन कर करते हैं । उनको अपने साथ रखते हैं और परिवार को खुशहाल बना कर रखते हैं, शायद इसीलिए आज भी दादा दादी नाना नानी जैसे रिश्तेदार घरों में मिल जाते हैं

जिंदगी में कांटे हो तो निकाल कर फेंक दे लेकिन जब इंसान काटो सा व्यवहार करने लगे तब क्या करें…..

 बुजुर्गों का दर्द

उम्र के इस पड़ाव में अकेले जीवन बिताना है,

झुर्रियों के अलावा सूखी टहनियों से भी खुद को बचाना है,

सुबह की चाय कपकपाते हाथों से धीरे-धीरे स्वाद लेना है,

औरों को शिकायत रहती है मिनटों का काम घंटों में लगाना है,

आवाज़ भी कम, सुनाई भी कम, जिंदगी की रफ्तार भी कम,

आस भी कम, उम्मीद भी कम, सभी से मिलना भी कम,

अब तनहाई अच्छी लगती है, जब जिंदगी में स्वाद है कम,

छोड़कर जाना आप सबको रास आता है,

पास बैठ के अब, सबको जमाना पुराना लगता है।।

Disclaimer – यहां पर लिखी सभी post किसी भी धर्म, मानवता के विपरीत नहीं है। यह केवल सिर्फ मेरे विचार हैं। जो केवल reader को अपने विचारों से अवगत कराना है। मेरे विचारों से सहमत होना या ना होना यह उनके विचारों पर निर्भर करता है। यहां जो भी कंटेंट है उसके सारे copyright, neetuhindi.com के हैं।

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