ग़म सांसारिक व्यथा है, ‘ आस्था ‘ मन और आत्मा से आती है। आस्था, जिसमें आपको पूर्ण विश्वास हो , सुख – दुख में आपके साथ रहे। आस्था एक ऐसा भाव है, जो कभी भी, किसी भी समय में मन में उत्पन्न हो सकता है । आस्था आपके विचारों को शुद्ध कर देती है। मन के भाव को पवित्र कर देती हैं । आस्था एक ऐसा मंत्र है, जो निराश जिंदगी को उम्मीद के दामन से भर देती है।

यह एक चमत्कार है , क्योंकि जहां मन – आत्मा उदास होती है, वही पर निराशा विराजमान होती है। लगता है , जैसे सब ख़त्म हो गया, जिंदगी ठहर गई, ना कही जाने का मन, ना किसी से मिलने का मन, जैसे जीवन मे अंधेरा छा गया हो, तब यही ‘आशा’ उम्मीद की किरण बनकर धीरे-धीरे जीवन को संभाल लेती है। अचानक सोचते हैं ! ‘सब ठीक हो जाएगा’ बस यही चार शब्द मन को ढाढस बांधने के लिए काफी होते हैं । यह चार शब्द का जादू तभी चलता है, जब मन में आस्था होती है, क्योंकि जहा आस्था होती है वहाँ आप अपना सारा फ़्रस्ट्रेशन आस्था गुरु पर निकाल देते हैं।

अपना सारा नकारात्मक भाव आस्था पर छोड़ देते हैं। जब शरीर से सारी नकारात्मक उर्जा निकल जाती है, और आँख से आंसू ख़त्म हो जाते है, शरीर ढीला पड़ जाता है, तब कही जाके थका शरीर भरपूर नींद लेता है और मन आत्मा शांत होती है । कुछ घंटों के बाद जब आंख खुलती है तो मन हल्का हो जाता है। भारी आंखे फिर से नई दुनिया देखने कि कोशिश करते है और अंततः अंदर मन से आवाज आती है, सब ठीक हो जाएगा। गम चाहे जैसा भी हो थोड़ा वक्त मिले, तो बड़े से बड़ा गम भुलाने की शक्ति आस्था अपने पास रखती है ।

सकारात्मक ऊर्जा

शारीरिक, मानसिक दुख चाहे जितना भी बड़ा हो, वक्त सब को भुलाने की गुंजाइश रखता है, शारीरिक, मानसिक तकलीफ वक्त के साथ या तो कम हो जाती है या और ज्यादा बढ़ जाती है। लेकिन हर दुख तकलीफ की भी एक सीमा होती है, और उसका अंत भी निश्चित होता है । जीवन में जो गम होता है , वह अलग -अलग रूप धारण कर खुशियों के आगे पीछे लगा रहता है , और मौका मिलते ही जीवन में प्रवेश कर मनुष्य को कष्ट पहुँचता रहता है ।

मनुष्य कितना भी श्रेष्ठ हो जीवन में अपार दुख सहने के बाद भी अगर वह मुस्कुराता है तो वह महान होता है। कितने ऐसे लोग हैं जो अपार दुख सहन कर, दूसरों के जीवन के लिए मिशाल बने हुए हैं । यह ऊर्जा उनके पास आती कहां से है? आखिर इसका स्रोत क्या है ? इन सवालों का जवाब सिर्फ और सिर्फ आस्था है।

आस्था के रंग

गम और आस्था दोनों शब्द के मायने एक दूसरे से विपरीत है। किंतु इनका जोड़ एक दूसरे पर निर्भर करता है, क्योंकि अक्सर यह देखा जाता है, कि जब-जब जीवन में दुख तकलीफ आता है, तब -तब आस्था का भाव बढ़ जाता है। मान मनौती के दाम लग जाते हैं।

अच्छा ! कितनी अजीब बात होती है, इसका असर भी जीवन में देखने को मिलता है। आस्था के फूल मन मंदिर को सुगंधित कर देते हैं और मन में विश्वास का दिया जलाए रखते हैं। अपने दुख से निजात पाने के लिए नए-नए उपचार ढूंढते रहते हैं, जो विश्वास और आस्था का दूसरा नाम है जैसे कि उपवास व मन्नते, पूजा – पाठ आदि।

उपवास व मन्नते

मन को शांत रखने के लिए व दुखों से छुटकारा पाने के लिए और मनोबल को बरकरार रखने के लिए , कई तरह के उपवास व मंनोत्तो का सहारा लेते हैं । यह आस्था का दूसरा रूप है। दुख तकलीफ से ध्यान हटाकर, दूजे काम में मन लगाना, जिससे ग़म से लड़ने के लिए कुछ वक्त मिल जाए। आस्था का यही काम होता है, वह वक्त हमें देती है और फिर दुख का इलाज हो जाता है , फिर चाहे कितने ही दुख तकलीफों का सामना करना पड़े, आस्था के रूप में तैयार रहते हैं, मन्नत मांगे उपवास करें या फिर पूजा पाठ में मन लगाए आस्था मन को मजबूत कर ही देती है, हर हाल में आस्था ही काम आती है । आस्था से सकारात्मक ऊर्जा का विकास होता है। जैसे कि देखा जाए गंगा का जल चाहे जितना भी दूषित हो, लेकिन जब गंगा का जल का छिड़काव पूरे घर में हो जाता है। तो सकारात्मक ऊर्जा के अनुभूत चारों तरफ से होने लगती है। जैसे लगता है दुख का अंत हो गया हैपर क्या वास्तव में ऐसा होता है? जवाब में उत्तर आता है नहीं, गम तो वहीं स्थित है । बस कुछ देर के लिए हम, उस गम से बाहर आ गए हैं और मानने लगते हैं सब ठीक हो गया है । लेकिन हमारी आस्था सोचने पर मजबूर कर देती है। हां ! सब कुछ ठीक हो गया और वास्तव में ऐसा ही होता है। जब मन शांत होता है। तब विचार भी अच्छे आते हैं। आखिर !में गहनता से सोचने के बाद यह पता चलता है कि आस्था ने मन में उठ रहे उथल-पुथल को संभाल लिया।

नियति और आस्था

नियत और आस्था होता वही है, जो नियति रच रखी है। उसमें हम कुछ भी फेरबदल नहीं कर सकते है। लेकिन आस्था वह औषधि है, जिसे लगाने के बाद नियति से मुकाबला करने की शक्ति आ जाती है। जीवन में बहुत कुछ ऐसा होता है जो हमें बहुत प्रिय होता है उसके बगैर जीने की कल्पना भी नहीं कर सकते लेकिन इस संसार में कुछ भी स्थिर नहीं है। सब कुछ परिवर्तनशील है। सब का अंत निश्चित है। अपने से बिछड़ने का दर्द, अपनों को खोने का दर्द, नियति एक ना एक दिन समस्त मनुष्य के सामने लाकर खड़ा कर देती है । आखिरकर अंत मे मनुष्य उसका सामना करता है ।

सकारत्मक सोच

जिंदगी में कुछ हो या ना हो लेकिन अगर आपके पास सकारात्मक सोच होती है। तो बड़े से बड़े गम से लड़ने की शक्ति आ ही जाती है। इसमें वह ऊर्जा होती है कि आप को कमजोर नहीं होने देती है। सकारात्मक सोच मनोबल को मजबूत कर देती है और जिंदगी को आगे बढ़ने का रास्ता दिखाती है। सकारात्मक सोच भीड़ से भी आप को अलग कर देती है। आप के अंदर सहनशीलता बढ़ जाती है।

आज भी गम में कटी रात, दर्द भी उतना ही रहा !

आंख से आंसू गिरते रहे, और दिल कहरता रहा !

गम की मियाद बढ़ती गई जब और जख्म गहरा होता गया!

काम ना आयी कोई दवा बस आस्था की सीढ़ी चढ़ता गया!

वक्त लगा बहुत मगर इलाज ए जख्म हो गया।।

दामन मिला उम्मीद का और धीरे-धीरे ग़म भूलता गया,

सोच ने मे उर्जा बदल गई, फ़िर फूल सारे खिल गए,

पथ में कांटे थे वहीं, मग़र आस्था-ए कदम आगे बढ़ गए।।

Disclaimer – यहां पर लिखी सभी post किसी भी धर्म, मानवता के विपरीत नहीं है। यह केवल सिर्फ मेरे विचार हैं। जो केवल reader को अपने विचारों से अवगत कराना है। मेरे विचारों से सहमत होना या ना होना यह उनके विचारों पर निर्भर करता है। यहां जो भी कंटेंट है उसके सारे copyright, neetuhindi.com के हैं।

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24 thoughts on “आस्था और ग़म”
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