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सरकारी नौकरी

 

(दरवाजा खटखट हुआ अंदर से आवाज आई,  माधव देखो कौन आया है ? )

माधव :   डाकिया आया है

माधव बाहर से अंदर तेज गति से आया, कमरे के भीतर अपनी दीदी को ढूंढने लगा,  तेज आवाज में बोला,  दीदी कहां हो ? (रसोई घर से आवाज आई।)
माधव वहां पहुंचा, दीदी देखो मेरे हाथ में सरकारी कागज है, मुझे नौकरी मिल गई, तुम्हारी तपस्या सफल हुए।
दीदी चुपचाप दीवार में सट गई और रूंधी हुई आवाज से बोली “हां भगवान ने सुन ली “।

दीदी :    तुम्हारे जीजा जी आते होंगे, उनके लिए मिठाई ले आओ, थोड़ी ज्यादा लाना, मोहल्ले भर में बाटूंगी, सब बहुत खुश हो जाएंगे। इनका चेहरा तो चमक जाएगा, बहुत मेहनत की है तुम्हें यहां तक पहुंचाने में, आज हम दोनों की तपस्या सफल हुई।

माधव :   ‘हां दीदी,’आज मैं जो कुछ भी हूं , उन्हीं की बदौलत हूं। जीजा जी ने मेरा बहुत साथ दिया,  अपने लड़के की तरह मुझे पाला है। आज वह साथ ना खड़े होते तो आज ये  नौकरी भी मुझे नहीं मिलती।

माधव :   मुझे यकीन नहीं होता दीदी मुझे सरकारी नौकरी मिल गई।
अब मैं सबके सपने पूरे कर दूंगा, तुम्हारे लिए नई साड़ी, गुड्डी के लिए ढेरों खिलौने,  अब कोई दिक्कत ना होने दूंगा, जीजा की दुकान में सामान भरवा दूंगा, फिर उनकी भी अच्छी सी दुकान चलेगी, मैं सब संभाल लूंगा।

दीदी :   माधव क्या हुआ? उदास क्यों बैठे हो?

माधव :   नौकरी दूसरे जिले में मिली है जॉइनिंग करने में, वहां रहने में लगभग  ₹10000 का खर्चा होगा, कहां से आएगा यह पैसा ? कैसे जा पाऊंगा?

 (जीजा जी अपनी साइकिल खड़ी करते हुए)

जीजा जी :  “बोले क्यों चिंता करते हो तुम अपने जाने का इंतजाम करो, गुड्डी के लिए जो पैसे जोड़ के रखे हैं उसका इस्तेमाल करो ,  पैसा तो जरूरत मे ही न काम आएगा। “

( कुछ महीनों बाद माधव वापस घर आया )

दीदी :   अरे तुम आ गये ! चलो खाना बन गया है खाना खा लो ।

माधव :   दीदी आपने पैसे मांगे थे, यह लिफाफा पकड़ो अब तक जो तुमने दिया है,  उससे ज्यादा  है। मैं नहीं चाहता मुझ पर कोई उधार रहे, तुम्हारी जरूरत पूरी हो जाएगी।

दीदी :   ” कैसा उधार “?

माधव :   अरे ! जो अब तक खर्चा किया है तुमने, उसका हिसाब है, पैसे से रिश्ते खराब होते हैं, इसलिए जिसका लो उसका वापस कर दो। यही तो समाज का नियम है।

दीदी :   बड़ी बड़ी बातें करने लगे हो,  हां ! गुड्डी के लिए जमीन खरीद कर छोड़ना था, सस्ती मिल रही थी, कम पड़ गए कुछ पैसे तो सोचा तुम से ले लू।

माधव :   दीदी पैसा बहुत मेहनत से कमाया जाता है, कल  को मेरा भी परिवार होगा,  मेरी भी शादी होगी,  पैसा जोड़ना है, अब इससे ज्यादा मदद नहीं कर पाऊंगा, दो चार सौ की मदद चाहिए तो कर दूंगा पर इससे ज्यादा की उम्मीद मत रखना,  पैसा भी उसी को देना चाहिए जो वापस कर सके और जितनी चादर हो उतने ही पैर पसारने चाहिए।

माधव की बात सुनकर दीदी की आंख में आंसू आ गया और सोचने लगी गुड्डी के पापा से कैसे बताएगी कि माधव बदल गया है,  गुड्डी के पापा ने तो बहुत उम्मीदें रखी हैं, कैसे?  वह बताएगी, दिल बैठा जा रहा है, मन ही मन दीदी सोचने लगी।  माधव की सोच बदल गई है।

आंख में आंसू छलकाती   हुई, चाय बनाने चली गई, और गरीबी मजबूरी की कशमकश में झूलने लगी

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